क्या न्याय चाहिए ?

बहुत से मसीही यह समझते हैं की इस संसार मे उन्हें न्याय मिलना चाहिए या उनके मानव अधिकार का यदि हनन हो रहा है तो उन्हें सत्याग्रह या आंदोलन करना चाहिए।

प्रभु यीशू ने हमें इस संसार से निकाल लिया है और हमें परमेश्वर के राज्य में ले लिया है। परमेश्वर का राज्य हमारे अंदर है जिसका मतलब है चाहे हम इस दुनिया के वासी क्यों ना हों फिर भी जो नियम हम पर लागू होते हैं और हम पालन करते हैं या जो विचारधारा या जीवन शैली हम अपनाते हैं वो इस संसार की नहीं है परमेश्वर के राज्य मैं हैं [उसका वचन मानते हैं – जैसे प्रभु यीशू में वचन देह्धारि हुआ]

हमें न्याय कौन देगा –

क्या हम अपने न्याय के अधिकार को इसलिए त्याग सकते हैं क्योंकि हमारा पूरा विश्वास है कि हमारा पिता परमेश्वर न्यायी है और वो हमारा न्याय करेगा?

प्रभु यीशू के साथ कैसा न्याय था?
परमेश्वर होने पर भी वो सिंहासन छोड़कर नौकर बना
उसने हमारे पाँव धोए और हमें बचाने के लिए क्रूस की मौत ले ली
यशायाह 53:7 में लिखा है – उसने अपना मुँह न खोला
ये सच है कि मुँह बंद रखने के लिए पवित्र आत्मा की शक्ति चाहिए और चिल्लाने के लिए शरीर की शक्ति

पीलुतूस के सामने वो चुप क्यों रहा?
उसने कहा ये अधिकार तुम्हें उपर से दिया गया है , नहीं तो तुम्हारा मुझ पर कोई अधिकार ना होता।
प्रभु यीशू कहते हैं – मैं दंड की आग्या देने नहीं आया, मैं बचाने आया हूँ।
क्रूस पर से उसने अपने हत्यारों को क्षमा क्यों किया न्याय द्वारा दंड क्यों नहीं चाहा?
उसने अपने आप का इन्कार करो ऐसा क्यों कहा?
क्रूस उठाकर हर दिन मरने का आव्हान क्यों किया?

क्या ये न्याय है जब प्रभु यीशू कहते हैं
कि कोई एक मील बेगार में ले जाए तो दो मील चले जाना
कोई यदि कुर्ता छीन ले जाए तो उसे दोहर भी दे देना
कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी फेर देना और दुश्मन से प्रेम करना

यदि हम हमेशा अपने लिए न्याय की माँग करते हैं तो हम इस दुनिया के हैं। यदि अपना न्याय परमेश्वर के हाथ छोड़ देते हैं तो हम परमेश्वर के राज्य के हैं।

आप किस राज्य में हैं ?

शिष्य थॉमसन