मैं अक्सर गावों में या शहरों में लोगों के बीच जाता हूँ और एक बात जो देखने में आती है वो यह कि आत्मिक बातें सरल नही लगती और परमेश्वर की पवित्र आत्मा का कार्य कठिन बातों को आसान बनाना है।
सरलता से आत्मिक बातों को समझें
- पाप
- शारीरिक स्वेच्छा
- कर्मों से मोक्ष नहीं
- मोक्ष का अर्थ
- पाप कहाँ से आया
- परमेश्वर के स्वरूप का अर्थ
- स्वतंत्रता जिसमें पाप का चुनाव संभव है
- अच्छे और बुरे के ज्ञान का पेड़ और फ़ल
- प्रभु यीशु का कार्य
- विश्वास क्या है
- विश्वास में जीने के सहायक
- मोक्ष प्रार्थना
आइए कुछ बातों को सरल करें
1. पाप है क्या [परिभाषा] –
पाप मनुष्य की उस स्वेच्छा को कहते हैं जो परमेश्वर की इच्छा ओर उद्देश्यों के विपरीत है या मेल नहीं खाती
2. पापमय स्वेच्छा का अस्तित्व – कर्मों में, विचारों में, मन में, हृदय में और उद्देश्यों में रहता है।
मनुष्य पाप करने से पापी नही बनता पर पापी स्वभाव होने के कारण पाप करता है और पापी कहलाता है क्योंकि मनुष्य का स्वभाव पापी है सत्य, पवित्रता और परमेश्वर से अलग होकर भटका हुआ है।
इसलिए एक या अनेक पापों से मतलब नही है। पाप ओर पवित्रता का मिश्रण नहीं होता है।
3. अच्छे कर्म काफ़ी नहीं हैं –
उदाहरण के लिए- यदि परीक्षा में पास होने के लिए 100 में 100 लाना है, तो जिसे 0 मिले और जिसे 99 मिले दोनों फेल हैं।
इसी कारण अच्छे कर्मों की मात्रा बढ़ने से हमारी पवित्रता का पलड़ा भारी नहीं होता है। तो पहला निष्कर्ष ये कि अच्छे कर्म जुटाने से मोक्ष नहीं मिलेगा लेकिन इसके विपरीत मोक्ष मिलने के द्द्वारा अच्छे कर्मों का जन्म होता है।
4. मोक्ष का अर्थ –
परमेश्वर से विलय नहीं है पर मिलन है, संगत है। हमारी आत्मा का ईश्वर धाम में पहुँचना है। इस संसार से मुक्त होकर पवित्र और आनंदमय युग मे प्रवेश करना है।
5. पाप आया कहाँ से –
बाइबल की पहली किताब उत्पत्ति में बड़े साफ शब्दों में इसका वर्णन है। परमेश्वर ने आदि में आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की और सारे जानवर, पक्षी, और ब्रह्मांड को बनाया। इसके बाद उसने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया।
6. परमेश्वर के स्वरूप का अर्थ –
परमेश्वर के गुण स्वभाव और इच्छा के अनुरूप जो स्वरूप है यही उसने मनुष्य को दिया। परमेश्वर के स्वभाव में स्वतंत्रता है ओर ये मनुष्य को भी दी गयी। इसका मतलब ये नहीं की मनुष्य दुष्कर्म का चुनाव करे।
7. पाप के चुनाव की स्वतंत्रता –
यदि हमें बोलने की आज़ादी है इसका अर्थ ये नहीं की हम झूट बोलें, या गाली दे सकते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं तो अपने स्वतंत्र चुनाव करने के अधिकार का दुरुपयोग करते हैं। बाइबल का वो निर्णायक दिन जब मनुष्य पाप में गिरा और उसका संबंध परमेश्वर से टूट गया।
8. अच्छे और बुरे के ज्ञान का पेड़ –
अदन का बाग परमेश्वर की सृष्टि थी। परमेश्वर ने हर भली बात बताई ओर हर ख़तरे से आगाह किया। हर व्रक्ष का फल खा सकते हैं पर एक पेड़ जो बाग के बीच में था उसका फल खानें की मनाही थी। उसका नाम था – अच्छे और बुरे के ज्ञान का पेड़ जिसके फल खाने से अच्छे और बुरे की सीमित जानकारी हो जाती है। ऐसा ज्ञान जो परमेश्वर के सत्य के विपरीत है।
नाम तो अच्छा है तो बुरा क्या था ?
वो ये कि इसे खाकर मनुष्य पाप करने के लिए स्वतंत्र हुआ अपने निर्णय स्वयं करेगा, अच्छा बुरा क्या है वो अपनी समझ से स्थापित करेगा, परमेश्वर के नियम मिटाकर अपने क़ानून बनाएगा, अपना सत्य स्थापित करेगा और अच्छा और बुरा दोनो करने में सक्षम हो जाएगा।
अंजाम यही हुआ – पहले मनुष्य आदम और हवा ने यही किया
मनुष्य फल ख़ाता है, आत्मिक रूप से मार जाता है और परमेश्वर और मनुष्य का संबंध टूट जाता
9. प्रभु यीशु ने क्या किया –
इस संसार में आकर परमेश्वर की इच्छा और जीवन और नियमों को प्रगट किया। परमेश्वर के प्रेम को प्रगट किया और हमें बताया की परमेश्वर हमारा पिता है जो हमें मुक्ति देता है।
10. विश्वास क्या है –
विश्वास एक अटूट निश्चय है जिसके होते हुए हम अपनी पापमय स्वेच्छा और उसके स्रोत शरीर के जीवन को अस्वीकार करते हैं। हम अपने पापी विवेक को अस्वीकार करते हैं ओर परमेश्वर के पुत्र प्रभु यीशु के मुक्ति उपाय और वचनों पर भरोसा करते हैं।
मुक्ति विश्वास द्वारा ही मिल सकती है
परमेश्वर की आत्मा हमारे अंदर प्रवेश करे, और ये विश्वास द्वारा संभव होता है। और सही मायने मे ये एक नया जन्म का अनुभव है क्योंकि हमारे शरीर में परमेश्वर का अंग निवास करने लगता है।
हमारे कर्म कांड, दान पुण्य, सोना चाँदी, धन दौलत, रीति रिवाज या धार्मिक कार्य पवित्र सर्वशक्तिमान परमेश्वर से मिलन के लिए काफ़ी नहीं हैं। उसकी कीमत कहीं अधिक है जिसे हम नहीं पूरा कर सकते हैं।
लेकिन खुशख़बरी ये है कि वो कीमत – प्रभु यीशु ने आकर अदा की है। पाप का मृत्युदंड उठाया है। बस अब उसकी दोहाई देना है, और दोहाई देने के पहले उस पर और उसके कार्य पर विश्वास करना।
11. विश्वास के जीवन का मार्गदर्शन कैसे होता है –
पवित्र आत्मा परमेश्वर की इच्छा / सत्य को दिखाता है और उस पर चलने का आग्रह करता है। ये हमारे मन, हृदय और सोच विचार में सत्य की प्रेरणा देता है।
परमेश्वर का वचन जो जीवित है, सत्य है और आत्मा है हमें समझ, बुद्धि और युक्ति प्रदान करता है। भजन 119
12. मोक्ष प्रार्थना –
प्रभु यीशू मेरा पूर्ण विश्वास है कि आपने मेरे पापों के बदले पवित्र खून बहाया है, मुझे माफी, नया जीवन और अपनी आत्मा का दान देकर मुक्ति प्रदान करो।
आमीन
शिष्य थॉमसन