प्रभु यीशू को कितना कीमती समझें

मरकुस १२ में प्रभु यीशु एक कुष्ठ हुए व्यक्ति जिसका नाम शमौन था उसके घर बैतनि में जाते हैं।

शायद कोढ़ होने के कारण उसके घर और कोई जाना पसंद ना करे।

प्रभु यीशु की दृष्टि में हर व्यक्ति कीमती है और उसका प्रेम उनपर है।

एक स्त्री वहाँ आती है और आकर वो ना कुछ बोले ना पूछे, उसके पास बस एक भेंट थी – जटामांसी का बहुमूल्य इत्र. और स्त्री उसे उसके सिर पर डाल देती है। शायद प्रभु यीशु के कपड़े भी इस कारण खराब क्यों ना हुए हों।

चेलों ना नाराज़गी दिखाई और कड़े शब्दों में कहा –

  • इत्र को सत्यानाश किया गया है।
  • 300 दिनार का नुकसान हुआ है।

यह ग़रीबों को दिया जा सकता था या यहूदा के बैंक अकाउंट में चला जाता ये पक्का नहीं है।

सवाल ये है – क्या प्रभु यीशू की कीमत – 300 दिनार के जटामांसी इत्र से कम नापी गयी ?

और सब के सामने उसकी निंदा की गयी?

कुछ ऐसे प्रतिक्रिया हुई जैसे आज की तारीख में यदि एक आम मज़दूर को कोई महँगा ब्रांडेड सूट दे दे।

प्रभु यीशू ने कहा – कंगाल तो तुम्हारे साथ सदा रहते हैं पर में ना रहूँगा। उस अंजान स्त्री की उसने प्रशंसा करी।

शायद उसे बात भी करना नही आता था, शायद अनपड़ थी, समझ नहीं थी।

प्रभु यीशू ने उसे उँचा स्थान दिया और कहा, जो कुछ वो कर सकी उसने किया – उसे छोड़ दो।


आप का क्या ख़याल है –

प्रभु यीशू के उपर लगाया समय बर्बाद हुआ – चन्द रुपये यदि लगाए तो क्या व्यर्थ हुए ?

यहूदा की नज़र मे 30 चाँदी के सिक्के अधिक कीमती थे।

आज आप के सामने सवाल है

शिष्य थॉमसन